“गिरते पुल, ढहती ज़िम्मेदारियाँ: बुनियादी ढांचे की सड़न और सुधार की ज़रूरत”

वडोदरा में पुल गिरना कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि भारत के जर्जर होते बुनियादी ढांचे की डरावनी सच्चाई है। पुरानी संरचनाएं, घटिया सामग्री, भ्रष्टाचार और निरीक्षण की अनुपस्थिति — यह सब मौत को दावत दे रहा है। राजनीतिक घोषणाएं तो बहुत होती हैं, लेकिन टिकाऊ निर्माण और जवाबदेही की योजनाएँ नदारद हैं। अब वक़्त है कि सरकार केवल निर्माण नहीं, निरीक्षण और संरक्षण को भी प्राथमिकता दे। वरना पुल ही नहीं, जनता का भरोसा भी बार-बार ढहेगा। विकास सिर्फ रफ्तार नहीं, मज़बूत नींव और ज़िम्मेदारी मांगता है — जो अभी बहुत कमज़ोर है।

डॉ. सत्यवान सौरभ

वडोदरा में 40 साल पुराने पुल का हालिया ढहना न केवल एक स्थानीय त्रासदी है, बल्कि यह पूरे भारत के बुनियादी ढांचे की बिखरती हकीकत की नुमाइश है। ऐसे हादसे अब चौंकाते नहीं, बल्कि लगातार दोहराए जाने वाले “सिस्टम फेल्योर” के आदतन प्रमाण बन चुके हैं। हर बार हादसे के बाद वही रटे-रटाए बयान, वही दिखावटी जांच कमेटी, और फिर वही खामोशी — जब तक अगला पुल न गिर जाए।

भारत विकास के पथ पर दौड़ रहा है, लेकिन इस दौड़ में जिन सड़कों, पुलों और इमारतों पर यह प्रगति टिकी है, वे खुद कब की चरमराने लगी हैं। सवाल यह नहीं कि वडोदरा में पुल क्यों गिरा, सवाल यह है कि देशभर में ऐसे कितने और पुल गिरने की कगार पर हैं और हमने अब तक उनसे क्या सीखा?

भारत में बीते एक दशक में सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे के ढहने की घटनाओं की एक लंबी सूची है। 2016 में कोलकाता का विवेकानंद फ्लाईओवर निर्माण के दौरान ही गिर गया, जिसमें 27 लोगों की जान गई। 2018 में वाराणसी में एक पुल का हिस्सा ढहने से कई लोग मारे गए। 2022 में गुजरात के मोरबी में केबल ब्रिज गिरने से 130 से अधिक लोग मारे गए। और अब 2024 में वडोदरा में पुल गिरा। इससे पहले बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल और असम में भी पुल ढहने की घटनाएं हुई हैं।

इन हादसों का पैटर्न स्पष्ट है — पुरानी संरचना, घटिया निर्माण सामग्री, लचर निरीक्षण व्यवस्था और पूरी तरह से अनुपस्थित जवाबदेही।

भारत के अधिकांश पुल, इमारतें और सार्वजनिक संरचनाएं 30 से 60 साल पहले बनी थीं। उस समय न तो जलवायु परिवर्तन की मार इतनी तीव्र थी, न ही ट्रैफिक और जनसंख्या का भार इतना अधिक। परंतु इन्हें कभी समय रहते मरम्मत नहीं मिली। “बन गया तो बन गया” की मानसिकता ने इन ढांचों को धीरे-धीरे मौत के कुएं में बदल दिया।

टेंडर प्रक्रिया में सबसे कम बोली लगाने वाले ठेकेदार को ठेका देना, फिर उसी ठेकेदार का बजट काटना, सस्ती सामग्री का उपयोग करना — यह सब इतना आम हो चुका है कि हम इसे भ्रष्टाचार मानना ही भूल गए हैं। यह एक संस्थागत भ्रष्टाचार है जिसमें प्रशासन, ठेकेदार और कभी-कभी राजनेता भी शामिल होते हैं।

क्या कभी आपने किसी पुल के पास बोर्ड देखा है जिस पर लिखा हो — “यह पुल अंतिम बार कब जांचा गया था?” शायद ही कभी। कारण स्पष्ट है — निरीक्षण नाम की प्रक्रिया कागजों में सिमट चुकी है। टेक्नोलॉजी का युग होने के बावजूद भारत के पास कोई केंद्रीकृत पुल स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली नहीं है।

पिछले कुछ वर्षों में असामान्य बारिश, बाढ़, अत्यधिक गर्मी और भूकंप जैसी घटनाओं में तेजी आई है। लेकिन हमारे अधिकांश ढांचों का डिज़ाइन इन नई चुनौतियों को ध्यान में रखकर नहीं हुआ था। कमजोर नींव, जल निकासी की खराब व्यवस्था और भूस्खलन की अनदेखी इसका परिणाम है।

भारत में बुनियादी ढांचे को राजनीतिक स्टंट के रूप में तो खूब इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन दीर्घकालीन संरचनात्मक मजबूती की कोई गंभीर योजना शायद ही कहीं देखी जाती है। “फिट फॉर फोटो” परियोजनाएं बनती हैं, जो जल्दी ढह भी जाती हैं।

हर साल सरकारें इंफ्रास्ट्रक्चर पर हजारों करोड़ का बजट पास करती हैं। पुल निर्माण, सड़क विस्तार, शहरी आवास योजना जैसी परियोजनाओं में भारी निवेश होता है। लेकिन यह बजट वास्तव में कहाँ जाता है? यदि पुल गिर रहा है तो इसका मतलब है कि या तो बजट जमीनी स्तर तक पहुँचा ही नहीं, या उसका दुरुपयोग हुआ।

भारत में अब विकास की चर्चा अर्थव्यवस्था की रफ्तार से नहीं, गिरने वाले पुलों की संख्या से होनी चाहिए।

अगर हमें भारत को सुरक्षित, सतत और सशक्त बनाना है तो हमें बुनियादी ढांचे की विश्वसनीयता सुनिश्चित करनी ही होगी।

बीस साल से अधिक पुराने सभी पुलों, इमारतों, फ्लाईओवर आदि का हर तीन वर्ष में एक बार स्वतंत्र संरचनात्मक परीक्षण अनिवार्य किया जाए। इसके निष्कर्ष सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हों।

एक स्वतंत्र राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा निरीक्षण प्राधिकरण का गठन किया जाए जो केवल निरीक्षण, रेटिंग और रिपोर्टिंग के लिए जिम्मेदार हो। इसकी रिपोर्ट सरकार के हस्तक्षेप से मुक्त हो।

पुलों में कंपन, भार, तापमान आदि की निगरानी के लिए सेंसर लगाए जाएं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणाली किसी भी अनियमितता पर तुरंत चेतावनी दे सकती है।

अब समय है कि टेंडर प्रणाली को केवल न्यूनतम बोली पर आधारित होने से रोका जाए। गुणवत्ता, तकनीकी क्षमता और पूर्व प्रदर्शन के आधार पर निर्माण एजेंसियों का चयन होना चाहिए।

स्थानीय निकायों को छोटे ढांचों की निगरानी में भागीदार बनाया जाए। ग्रामीण और शहरी स्तर पर नागरिकों को प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे संभावित जोखिम की जानकारी समय रहते दे सकें।

हर संरचना को जलवायु परिवर्तन के खतरों को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किया जाए। भारतीय मानक ब्यूरो और सड़क विकास परिषद जैसे संस्थानों के मानकों को सख्ती से लागू किया जाए।

जहां सरकार की नीयत कमजोर होती है, वहाँ मीडिया और नागरिक समाज की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। पुल गिरने के बाद कवरेज तो होता है, पर क्या हमने कभी उस निर्माण एजेंसी का नाम याद रखा? क्या किसी ठेकेदार पर आपराधिक मामला दर्ज हुआ?

आरटीआई कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और टेक्नोलॉजी विशेषज्ञों को साथ लाकर एक जन-जवाबदेही मॉडल बनाना ज़रूरी है।

तेजी से हो रहे शहरीकरण और विकास की होड़ में भारत कहीं सुरक्षा और स्थिरता को नजरअंदाज कर रहा है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है — क्या हम केवल पुल बना रहे हैं या विश्वास के पुल भी बना रहे हैं? क्योंकि जब कोई पुल गिरता है तो सिर्फ कंक्रीट नहीं टूटता, जनता का प्रशासन पर से विश्वास भी चकनाचूर हो जाता है।

भारत का भविष्य शानदार हो सकता है, लेकिन उसके लिए नींव का मजबूत होना जरूरी है। वडोदरा का पुल गिरा है, कल कहीं और गिरेगा — अगर हमने अपनी दृष्टि और नीति नहीं बदली। हमें प्रतिक्रियात्मक शासन से आगे बढ़कर सक्रिय बुनियादी ढांचा नीति की ओर बढ़ना होगा। नहीं तो हम हर साल पुलों की कब्रगाहें बनाते रहेंगे और नागरिकों की लाशें उठाते रहेंगे।

बुनियादी ढांचे को केवल निर्माण की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा के आधार पर देखना होगा। केवल निर्माण नहीं, संरक्षण और सुधार की नीति ही देश को टिकाऊ भविष्य की ओर ले जाएगी।

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