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हिंदी है माथे की बिंदी सदा सजाए रखना है,

आन पड़े पैरों तले ये ध्यान सदा हमें रखना है।
इन्हीं पंक्तियों के साथ पुष्पा सिंह विसेन की यात्रा का विवरण उनके शब्दों में।
मेवाड़ एक्सप्रेस में हिंदी दिवस की शाम जब हम श्रीनाथ द्वारा से लौट रहे थे तब मुझे केंद्रीय विद्यालय के दो ऐसे शिक्षक मिले जो दिव्य चक्षु थे। और वो कवि एवं गायक हैं डा.संजय श्रेष्ठ कवि हैं और हार्दिक पांड्या गायक, फिर क्या था।

 

लौह पर गामिनी की उस यात्रा में एक श्रेष्ठ गोष्ठी का आयोजन हो गया। भरतपुर के वरिष्ठ साहित्यकार और व्यंग्यकार डा.ओम प्रकाश आजाद के सानिध्य और अध्यक्षता में पहले मां शारदे की वंदना हुई और उसके बाद दिव्यदृष्टि डा.संजय ने अपने काव्य पाठ से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। उसके बाद डा.हार्दिक पांड्या ने बहुत ही श्रेष्ठ भजन गाया । उसके बाद दिल्ली से आई डा.पुष्पा विसेन का काव्य पाठ हुआ,अपने अनेक सारगर्भित रचनाओं से सभी को मंत्रमुग्ध किया। उसके बाद अध्यक्ष डा.ओम प्रकाश ने अपने व्यंग्य रचना से सभी को खूब हंसाया।
उसके बाद द्वितीय सत्र में देश और समाज में व्याप्त विषमताओं पर सार्थक चर्चा हुई और सभी ने देश और समाज को श्रेष्ठ बनाने के संदर्भ में अपने विचार रखते हुए हिंदी भाषा के वर्चस्व के लिए संकल्प किया। सभी अपने अपने क्षेत्र में हिंदी के प्रचार प्रसार के साथ भाषाई एकता के लिए काम करेंगे।
पुष्पा विसेन ने अंत में पंक्तियां पढ़ते हुए एक सफल गोष्ठी का समापन किया।
श्रोता गण में आदित्य गुप्ता एवं भावना और अन्य पांच व्यक्तियों की उपस्थिति रही। आदित्य ने फोटो ग्राफी किया और मुझे भेजा।ताकि यह खबर मैं मिडिया में भेज सकूं।
दिव्यचक्षु (रौशनी रहित आंखों वाले) दोनों शिक्षक अपने स्थानांतरण के लिए बहुत समय से निवेदन पत्र प्रेषित कर रहें हैं और सभी का काम हो रहा है लेकिन उनके संदर्भ में बहुत देर कर रहे अधिकारियों से मिलकर कार्य नहीं होने का कारण जानने हेतु वो हिंदी दिवस पर दिल्ली आ रहे थे।उनका कार्य जल्द हो जाएगा सभी ने संवेदना के साथ कहा। तत्पश्चात सभी ने एकसाथ मिलकर कर रात्रि आहार को ग्रहण किया जिसमें श्रीनाथ द्वारा से मिली दो थालियों के स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया।
डा. पुष्पा सिंह विसेन ने, गुलाबी पटका और श्री नाथ जी का बैच लगाकर दोनों श्रेष्ठ शिक्षकों का सम्मान किया।और प्रसाद एवं फल भी उन्हें दिया। शिक्षक गण के साथ दो सहयोगियों का आचरण एवं व्यवहार बहुत सराहनीय रहा।
एक दर्जन लोगों में चार कवियों और आठ श्रोताओं ने बहुत ही अच्छी प्रकार से हिंदी भाषा के संदर्भ में सहयोग के साथ काम करने का प्रण लिया।

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