सत्ता बदलने के साथ व्यवस्था बदलने की दरकार
अघोषित आपातकाल के चलते संवैधानिक संस्थाओं का हो रहा भारी दुरुपयोग
रीवा । समता सम्पर्क अभियान के राष्ट्रीय संयोजक लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा कि 51 साल पहले 25 जून 1975 को देश पर थोपा गया आपातकाल देश की जनता की आवाज के विरुद्ध संवैधानिक प्रावधानों का दुरुपयोग था। आपातकाल सिर्फ याद करने की रस्म अदायगी नहीं बल्कि भविष्य के लिए भी सबक है। लोकतंत्र को बचाने के लिए देश के संविधान को बचाने की जिम्मेदारी भी लोकतंत्र सेनानियों की है। नागरिक आजादी पर हो रहे किसी भी तरह के हमले का अहिंसात्मक प्रतिकार हमारा मौलिक अधिकार है। श्री खरे ने बताया कि गुरुवार 25 जून को आपातकाल के पूरे 51 साल हो रहे हैंं। तत्कालीन इंदिरा सरकार ने आपातकाल को सही ठहराने कई महत्वाकांक्षी योजनाओं एवं कार्यक्रमों को लागू किए लेकिन इससे छीनी गई नागरिक आजादी की भरपाई कैसे हो सकती थी। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रोटी और आजादी दोनों की अहमियत है। रोटी के बिना आजादी अधूरी है और आजादी के बिना रोटी गुलामी का एहसास कराती है। किसी भी नागरिक को बिना कारण बताए , बिना मुकदमा चलाए लंबे समय तक जेल में रखना नागरिक आजादी पर सीधा हमला था। मीसा बंदियों को न्यायिक प्रक्रिया से दूर रखा गया था। आज भी कई मामले ऐसे देखने को मिलते हैं जिसमें सरकार का विरोध करने पर रासुका में बंद कर दिया जाता है। प्रभावशाली बलात्कारियों को पैरोल पर छोड़ा जा रहा है, उनकी सजा कम की जा रही है, यहां तक उनका अभिनंदन भी हो रहा है लेकिन राजनीतिक बंदियों के साथ बर्बरता की जा रही है।
लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने बताया कि आपातकाल में कई कट्टरपंथी सांप्रदायिक संगठनों को भी प्रतिबंधित किया गया था। अपराधियों की भी धर पकड़ हुई थी लेकिन लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहे संपूर्ण क्रांति के आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश इंदिरा सरकार को काफी महंगी पड़ी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण संपूर्ण क्रांति आंदोलन के माध्यम से देश की राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में बुनियादी बदलाव चाहते थे लेकिन भारी विडंबना है कि उनका सपना आज भी अधूरा है। सत्ता तो बदलती है लेकिन व्यवस्था नहीं बदल रही। श्री खरे ने कहा कि करीब 90 साल के स्वतंत्रता आंदोलन के चलते देश आजाद हुआ। ऐसी स्थिति में किसी सरकार का जन आंदोलन से डर कर आपातकाल लगाना सही नहीं ठहराया जा सकता।
लोकतंत्र सेनानी श्री खरे ने कहा कि आपातकाल के संवैधानिक प्रावधान का दुरुपयोग होने के कारण श्रीमती इंदिरा गांधी के द्वारा सन 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बांग्लादेश के निर्माण की उपलब्धि को भी जनता ने अनदेखा कर दिया। आखिरकार जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने सन 1977 में लोकसभा चुनाव कराए तो वह भारी जन आक्रोश का शिकार बनीं। देश की जनता ने वोट क्रांति की। यहां तक प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए वह अपनी रायबरेली लोकसभा सीट भी हार गईं।
लोकतंत्र सेनानी श्री खरे ने कहा कि आपातकाल जैसी पुनरावृत्ति ना हो इसके लिए भारत के संविधान को मजबूत बनाए रखने की जरूरत है। जनसाधारण में ईमानदारी त्याग बलिदान संविधान के प्रति भावनाएं मजबूत हों इसका प्रयास विशेष रूप से किया जाना चाहिए। आपातकाल में सत्तारूढ दल के द्वारा बहुमत का दुरूपयोग हुआ था। बहुमत की तानाशाही रोकने के लिए देश को मजबूत विपक्ष की जरूरत रहती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता पर जनता का अंकुश रहना चाहिए। डॉ लोहिया कहते थे कि जिंदा कौमें 5 साल इंतजार नहीं किया करती हैं। लोकतंत्र का तकाजा है कि सरकारों को रोटी की तरह उल्टा पुल्टा जाए। राजनीति में व्यक्ति पूजक व्यवस्था से तानाशाही जन्म लेती है और फिर आपातकाल जैसे हालात से देश को जूझना पड़ता है। श्री खरे ने बताया कि आपातकाल के दौरान उन्होंने भी 18 महीने से अधिक समय मीसा में निरुद्ध रहते हुए रीवा केंद्रीय कारागार में बिताया है। इसके चलते वह नागरिक आजादी को लेकर सतत संघर्षशील हैं। पिछले कई सालों से देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति का सवाल लोगों के दिल दिमाग में है। देश में न्यायिक प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर फर्जी एनकाउंटर और बुलडोजर अभियान चलाया जा रहा है। भारतीय न्याय व्यवस्था को तिलांजलि दी जा रही है। यह बात काफी चिंताजनक है, इस बारे में भी गंभीरता से सोचा जाना चाहिए।

