पूर्व CJI बीआर गवई का विशेष इंटरव्यू:
पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बी.आर. गवई ने 23 नवंबर 2025 को अपना पद छोड़ दिया। रिटायरमेंट के ठीक बाद उन्होंने इंडिया टुडे/आजतक को दिए विशेष इंटरव्यू में कई संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बात की। इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई और अनीषा माथुर ने सवाल पूछे। उन्होंने जूता फेंकने की घटना से जुड़े ‘हिंदू विरोधी’ आरोप को सिरे से खारिज किया और रिटायरमेंट के बाद सरकारी पद न लेने का ऐलान किया। आइए, इंटरव्यू के प्रमुख बिंदुओं पर नजर डालें:
जूता फेंकने की घटना और ‘हिंदू विरोधी’ आरोप
गवई ने 2024 में एक वकील द्वारा उन पर जूता फेंकने की घटना का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस घटना से वे व्यक्तिगत रूप से आहत नहीं हुए, लेकिन इससे सोशल मीडिया पर उनकी टिप्पणियों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। विशेष रूप से, कुछ लोगों ने उन्हें ‘हिंदू विरोधी’ करार दिया, जिसे उन्होंने पूरी तरह गलत बताया। उनका स्पष्ट बयान था: “मुझे हिंदू विरोधी कहना पूरी तरह गलत था… मुझे नहीं पता उस घटना के पीछे क्या मकसद था।” इस घटना के बाद वे कोर्ट की टिप्पणियों को लेकर ज्यादा सतर्क हो गए, क्योंकि निर्दोष बयानों को गलत तरीके से प्रचारित किया जा रहा था। उन्होंने सोशल मीडिया कवरेज पर नियमन की जरूरत पर जोर दिया।
रिटायरमेंट के बाद के प्लान: सरकारी पदों से दूरी
गवई ने रिटायरमेंट के बाद सरकार से कोई पद न लेने का फैसला दोहराया। उन्होंने कहा कि वे राज्यपाल या राज्यसभा सदस्य जैसे पद नहीं स्वीकारेंगे। हालांकि, राजनीति में जाने की संभावना पर उन्होंने पूरी तरह दरवाजा बंद नहीं किया। उनका फोकस महाराष्ट्र के अमरावती (उनके मूल जिले) में आदिवासी समाज के कल्याण पर होगा। बयान: “नहीं स्वीकार करूंगा सरकारी पद।”
हेट स्पीच पर सख्त रुख
हेट स्पीच को समाज को बांटने वाला बताते हुए गवई ने संसद से अपील की कि इसके खिलाफ सख्त और स्पष्ट कानून बनाया जाए। उन्होंने कहा: “हेट स्पीच समाज को बांटती है। इसके खिलाफ सख्त और स्पष्ट कानून की जरूरत है।” उनका मानना है कि सरकार को इस दिशा में तुरंत कदम उठाने चाहिए।
बुलडोजर जस्टिस पर टिप्पणी
बुलडोजर जस्टिस (अवैध निर्माणों पर बुलडोजर कार्रवाई) को लेकर उन्होंने कहा कि कानून का शासन सर्वोपरि होना चाहिए, लेकिन बुलडोजर को प्रभावी ढंग से लागू करना जरूरी है। यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्दोष प्रभावित न हों।
न्यायिक भ्रष्टाचार और स्वतंत्रता
न्यायिक भ्रष्टाचार के आरोपों पर गवई ने संसद की जिम्मेदारी बताई। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार की जांच और सजा की प्रक्रिया तेज होनी चाहिए। PMLA (धन शोधन निषेध कानून) मामलों में जमानत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जेल को नहीं। बेंच फिक्सिंग के आरोपों को खारिज करते हुए बोले: “मेरे कार्यकाल में न तो सरकार से किसी ने फोन किया, न किसी तरह का दबाव डाला गया। ट्रांसफर और नियुक्तियों में कोई हस्तक्षेप नहीं हुआ।” उन्होंने जोड़ा कि जजों को साबित करने की जरूरत नहीं कि वे स्वतंत्र हैं—फैसले तथ्यों पर आधारित होने चाहिए, न कि सरकार के खिलाफ होने पर।
कोलेजियम व्यवस्था का बचाव
कोलेजियम सिस्टम (जजों की नियुक्ति प्रक्रिया) को बरकरार रखने की वकालत करते हुए गवई ने कहा कि असहमति सामान्य है। जस्टिस नागरत्ना की असहमति का उदाहरण देते हुए बताया कि अगर कोई सिफारिश में दम होता, तो अन्य सदस्य सहमत होते। युवा उम्मीदवारों के करियर की रक्षा के लिए कारण सार्वजनिक न करने का फैसला सही था।
अन्य मुद्दे: प्रदूषण और न्यायिक चुनौतियां
प्रदूषण पर चिंता जताते हुए कहा कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में पर्याप्त स्टाफ नहीं है। कार्यपालिका को कोर्ट के आदेशों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए। कुल मिलाकर, गवई ने रिटायरमेंट को एक नई शुरुआत बताया और कहा कि कुछ मुद्दों पर अमल न कर पाने का मलाल है, लेकिन आगे योगदान देने को तैयार हैं।
यह इंटरव्यू रिटायरमेंट के बाद का पहला बड़ा बयान है, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सामाजिक मुद्दों पर उनकी स्पष्ट सोच को दर्शाता है। अगर आपको वीडियो या और डिटेल्स चाहिए, तो आजतक की वेबसाइट पर उपलब्ध है।

