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“घाटी के आँसू”

घाटी जहाँ फूल खिलते थे, अब वहाँ सिसकती शाम,
वेदना की राख पर टिकी, इंसानियत की थाम।
कहाँ गया वह शांति-सूर्य, जो पूरब से उठता था?
आज वहाँ बस मौन है, जहाँ कल गीत बहता था।

पहलगाम की घाटियाँ, रोईं बहाये नीर।
धर्म पे वार जो हुआ, मानवता अधीर।
संगिनी का चीखना, गूँजा व्याकुल शोर।
छिन गया पल एक में, उसका जीवन भोर।

हिंदुस्तानी रक्त में, साहस भरा अपार।
आतंकी के हर कदम, होंगे अब लाचार।
श्रद्धा पे जो वार है, वह कायरता जान।
ऐसे नरपिशाच की, कब होगी पहचान?

वो जो चला तीर्थ को, दिल में लिए यकीन।
मार दिया उसको वहीं, क्यूँ इतना अधीन?
आस्था के मार्ग पर, अब भय का पहरा।
कहाँ गया वो ज़मीर, कहाँ गया सवेरा?

धूप-छाँव का देश है, फिर भी सबका एक।
नफरत के सौदागरों, मत खेलो ये खेल।
चुप्पी साधे लोग जो, देख रहे तमाशा।
एक दिन पूछेगा वक्त, कहाँ थी तुम्हारी भाषा?

अब न मौन रहो, न सहो ये छद्म धर्म का दंश,
हर दिल में दीप जलाओ, करुणा से करें नवं अंश।
सत्य ही शस्त्र बने, स्वर ही अग्निवाण,
इस घाटी की पीड़ा में, छिपा है हिंदुस्तान।

प्रियंका सौरभ

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