तेजस्वी यादव और आरजेडी की बिहार विधानसभा चुनावों में हार के पीछे कई रणनीतिक और छवि-संबंधी चूकें जिम्मेदार रहीं। आजतक की एक विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य रूप से पांच प्रमुख कारण सामने आए हैं। आइए इन्हें विस्तार से समझते हैं:
यादव उम्मीदवारों को अत्यधिक टिकट देना: आरजेडी ने 144 सीटों पर कुल 52 यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया, जो कुल प्रत्याशियों का लगभग 36% था। यह 2020 के 40 से भी ज्यादा था, जिससे पार्टी की जातिवादी छवि और मजबूत हो गई। इससे गैर-यादव वोट बैंक, खासकर कुर्मी-कोइरी समुदाय, दूर हो गया। बीजेपी ने ‘आरजेडी का यादव राज’ का नैरेटिव चलाकर शहरी और मध्यम वर्ग में इसका फायदा उठाया। अगर टिकट 30-35 तक सीमित रखे जाते, तो कुर्मी-कोइरी वोटों का 10-15% हिस्सा बढ़ सकता था, जैसा कि अखिलेश यादव ने 2024 लोकसभा चुनाव में केवल 5 यादव प्रत्याशियों के साथ किया।
सहयोगी पार्टियों को भाव न देना: तेजस्वी की रणनीति में महागठबंधन के सहयोगियों (कांग्रेस, वाम दल) को बराबरी का दर्जा न मिलना बड़ी चूक साबित हुई। सीट बंटवारे पर विवादों से गठबंधन कमजोर पड़ा और वोट ट्रांसफर फेल रहा। तेजस्वी ने ‘आरजेडी सेंट्रिक’ अप्रोच अपनाई, कांग्रेस की ‘गारंटी’ मेनिफेस्टो को नजरअंदाज किया, जबकि खुद के ‘नौकरी देंगे’ वादे को प्राथमिकता दी। घोषणापत्र का नाम ‘तेजस्वी प्रण’ रखा गया और रैलियों में राहुल गांधी की तस्वीरें कम, तेजस्वी की ज्यादा दिखीं, जिससे सहयोगी पीछे छूट गए।

