माधव खोसला
(मूल अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद: एस. आर. दारापुरी
(नोट: लेख के इस हिस्से में भारत में तानाशाही की स्थापना में सुप्रीम कोर्ट के योगदान की चर्चा की गई है)
अदालतों का तानाशाही की ओर झुकाव
अगर पाकिस्तान का उदाहरण अदालतों द्वारा तानाशाही की ओर बढ़ने को मंज़ूरी देने का साफ़ मामला है, तो भारत का उदाहरण उतना सीधा नहीं है। अपनी आज़ादी के बाद के ज़्यादातर समय में, भारत ने उन आम मुश्किलों का सामना नहीं किया जो आज़ाद हुए देशों में अक्सर देखी जाती हैं। हालाँकि भारत के कामकाज के कुछ पहलुओं—जैसे सरकार की ज़बरदस्ती वाली कार्रवाई, शासन की विफलताएँ, अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार और नागरिक-राजनीतिक अधिकारों को लागू करना—पर कभी-कभी चिंताएँ जताई गई हैं, फिर भी देश ने—1975-77 की असाधारण इमरजेंसी को छोड़कर—हमेशा निष्पक्ष चुनाव कराए हैं और संवैधानिक लोकतंत्र के सिद्धांतों को बनाए रखा है। लेकिन पिछले दशक में हालात बदले हैं। 2014 में हिंदू-राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी (BJP) की जीत के बाद से, पूरे संवैधानिक ढांचे में कई धीरे-धीरे होने वाले बदलाव हुए हैं, जिन्होंने देश को तानाशाही की दिशा में धकेला है। ये बदलाव अलग-अलग क्षेत्रों में हुए हैं। यहाँ, मैं उनमें से कुछ का ज़िक्र करूँगा—और उन्हें सही ठहराने में भारत के सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर प्रकाश डालूँगा।
नागरिक समाज से जुड़े एक उदाहरण पर विचार करें। भारत के ‘विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम’ (FCRA) में 2020 में किए गए एक संशोधन ने नागरिक समाज और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के काम करने की क्षमता को बुरी तरह सीमित कर दिया; ऐसा आंशिक रूप से फंडिंग पर नई पाबंदियाँ लगाकर किया गया। ऐसे संगठनों के लिए आदर्श नियमन व्यवस्था क्या हो, इस पर एक बड़ी बहस हो सकती है। हमारे मकसद के लिए, 2020 के बदलावों की समीक्षा करने वाले मामले—नोएल हार्पर बनाम भारत संघ (2022)—में जो बात ध्यान देने लायक थी, वह थी नागरिक समाज और दुश्मन ताकतों के बीच सांठगांठ पर सुप्रीम कोर्ट का ज़ोर, और भारतीय राष्ट्र-राज्य के लिए गंभीर खतरों पर उसकी चिंता। कोर्ट ने कहा कि “विदेशी चंदा” “औषधीय गुणों से भरपूर एक सुखद नशे की चीज़ जैसा है और अमृत की तरह काम कर सकता है।” हालांकि विदेशी फंडिंग “तब तक दवा का काम करती है जब तक इसे सही मात्रा में और समझदारी से इस्तेमाल किया जाए,” लेकिन इसमें “पूरे देश में ज़हरीले पदार्थ की तरह दर्द, तकलीफ़ और उथल-पुथल पैदा करने की क्षमता भी होती है।”15 देश के अस्तित्व के लिए खतरे को देखते हुए, कानून में किए गए बदलाव न केवल सही थे—बल्कि ज़रूरी भी थे।
विरोध करने के अधिकार से जुड़े मामलों में भी ऐसा ही नज़रिया देखने को मिलता है। यहाँ सबसे अहम उदाहरण ‘अमित साहनी बनाम पुलिस कमिश्नर (2020)’ का है, जो 2019 में भारत के नागरिकता कानून (जिसमें मुसलमानों के साथ अलग तरह के बर्ताव का प्रावधान था) में बदलाव के विरोध में नई दिल्ली में प्रदर्शनकारियों द्वारा सार्वजनिक सड़क जाम करने से जुड़ा था।16 यह बात सच है कि सभी देश, चाहे वे कितने भी उदार क्यों न हों, प्रदर्शनकारियों की गतिविधियों पर कुछ पाबंदियाँ लगाते हैं, लेकिन यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन की नीयत पर सवाल उठाए। समस्या यह नहीं थी कि विरोध प्रदर्शन अपनी जायज़ सीमाओं से आगे बढ़ गए थे; समस्या प्रदर्शनकारियों की अपनी ईमानदारी को लेकर थी। कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि कैसे उन्होंने अपने निजी मक़सद पूरे करने की कोशिश की और कैसे सोशल मीडिया के दौर में सामाजिक आंदोलनों ने अपनी नैतिक दिशा खो दी है। कोर्ट ने याद दिलाया कि संविधान न केवल अधिकार देता है बल्कि कर्तव्य भी तय करता है।
ऐसे मामले नागरिक समाज और असहमति के प्रति सरकार के शक को पुख्ता करते हैं और साफ़ करते हैं: ‘नोएल हार्पर’ मामले में कहा गया कि गैर-सरकारी संगठन विदेशी नियंत्रण के गुलाम बन गए हैं और देश-विरोधी ताकतें देशद्रोही एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए उनका इस्तेमाल कर रही हैं, जबकि ‘अमित साहनी’ मामले में प्रदर्शनकारियों और उनके मक़सद की ईमानदारी पर सवाल उठाए गए। ज़ाहिर है, ये बातें ट्रायल से पहले हिरासत (प्री-ट्रायल डिटेंशन) वाले मामलों में सबसे ज़्यादा साफ़ तौर पर दिखती हैं।
हाल के वर्षों में, 1967 का ‘गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम’ (UAPA)—जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कानून है—सरकार के हाथों में एक बेहद ताकतवर हथियार बन गया है। हालाँकि सज़ा मिलने की दर कम है, लेकिन धीमी गति से चलने वाली न्यायिक व्यवस्था में हिरासत में रखने के नियम का मतलब है कि एक बेगुनाह व्यक्ति सालों तक गिरफ़्तार रह सकता है। कानून की अपनी परिभाषाओं और अपराधों के दायरे के कारण स्थिति और भी खराब हो जाती है। नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी बनाम ज़हूर अहमद शाह वटाली (2019) मामले में, जिसमें UAPA शामिल था, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत ज़मानत न मिलने का पैमाना, आरोप तय करने के पैमाने से कम था।17 इसलिए, अगर आरोप तय हो गए हैं, तो ज़मानत मिलने की कोई गुंजाइश नहीं बचती—यह एक चिंताजनक नतीजा है क्योंकि आरोप तय करने का पैमाना ‘प्रथम दृष्टया’ (prima facie) का कमज़ोर आधार होता है और इसलिए यह अपेक्षाकृत कम होता है। [पृष्ठ 52 का अंत] फैसले में यह भी कहा गया कि ज़मानत पर विचार करते समय, चाहे व्यक्ति पर आरोप तय किए गए हों या नहीं, अदालतों को केवल पुलिस द्वारा पेश किए गए सबूतों को ही स्वीकार करना होता है। जजों के पास अब अपनी समझ या विवेक का इस्तेमाल करने की गुंजाइश नहीं है; वे खुद सबूतों की व्याख्या नहीं कर सकते। ज़मानत अर्ज़ी पर विचार करते समय, अदालत को “[केस] दस्तावेज़ की सामग्री को देखना था और उस दस्तावेज़ को वैसा ही मानना था जैसा वह है।” आसान शब्दों में कहें तो, वटाली मामले ने न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को एक प्रशासनिक और नौकरशाही वाली प्रक्रिया में बदल दिया।
एक और कानून जिसने भारतीय राज्य की शक्तियों को काफी बढ़ाया है, वह है प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA)। 2002 में पहली बार लागू हुए इस कानून में कई बार संशोधन किए गए हैं—खासकर 2019 में। PMLA उस मनी लॉन्ड्रिंग पर ध्यान केंद्रित करता है जो किसी ‘प्रेडिकेट ऑफ़ेंस’ (मूल अपराध) से जुड़ी होती है: आसान शब्दों में, कोई व्यक्ति अपराध करता है और फिर उस काम से मिली रकम को लॉन्डर (साफ़) करता है। 2019 के संशोधन के बाद, PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग में अब ये दो चरण शामिल नहीं हैं। आखिरी ट्रांज़ैक्शन का चरण, जिसमें अपराधी यह दावा करता है कि पैसा साफ़ है और उसे बदलने की कोशिश करता है (वह चरण जिसमें ‘मेन्स रिया’ या आपराधिक इरादे का तत्व शामिल होता है), अब मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध के लिए ज़रूरी नहीं है। बस इतना ज़रूरी है कि कोई व्यक्ति अपराध से मिली रकम से जुड़ा हो। नतीजतन, कोई भी अपराध जिससे आर्थिक लाभ होता है—जैसे, किसी व्यक्ति को हत्या करने के लिए पैसे मिलते हैं—तो मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध उसी समय हो जाता है जब मूल अपराध (प्रेडिकेट ऑफ़ेंस) किया जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हत्या करने के लिए पैसे मिलने पर, वह व्यक्ति अपराध से मिली रकम से जुड़ जाता है। और भी गंभीर बात यह है कि एक निर्दोष व्यक्ति, जिसे सामान्य आर्थिक लेन-देन के दौरान अपराध से मिली रकम मिलती है, वह भी इस कानून के तहत मुश्किल में पड़ सकता है क्योंकि उसका उस पैसे से संबंध होता है।
PMLA के तहत, जांच, तलाशी, संपत्ति ज़ब्त करने, गिरफ़्तारी आदि की शक्तियां ‘डायरेक्टरेट ऑफ़ एनफोर्समेंट’ (ED) के पास होती हैं। ED की शक्तियां असाधारण हैं—इनका इस्तेमाल तब भी किया जा सकता है जब मूल अपराध के संबंध में किसी व्यक्ति के खिलाफ़ कोई जांच या औपचारिक आरोप न हो। शुरू में, कानून में कुछ खास मूल अपराधों के मामले में ज़मानत के लिए कड़े नियम थे, लेकिन 2018 के संशोधन ने मूल अपराध पर विचार करने की शर्त हटा दी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े सभी मामलों में बिना किसी भेदभाव के कड़े नियम लागू कर दिए। मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में ज़मानत की सुनवाई और ट्रायल एक विशेष अदालत द्वारा किए जाते हैं। अंतरिम राहत और अंतिम ट्रायल, दोनों ही मामलों में सबूत पेश करने की ज़िम्मेदारी उलट जाती है—यानी, यह आरोपी पर होती है। [पेज 53 का अंत]
ज़मानत और सज़ा पर इन प्रावधानों का असर बहुत गहरा है। आम तौर पर, गिरफ़्तार व्यक्ति जो ज़मानत या बरी होने की कोशिश करता है, वह यह साबित करने की कोशिश करेगा कि अपराध से मिली कमाई को लॉन्डर करने की कोई कोशिश नहीं की गई थी। लेकिन, अजीब बात यह है कि PMLA में 2019 के बदलाव के बाद, अपराध से मिली कमाई से कोई भी संबंध होने का मतलब ही मनी लॉन्ड्रिंग है। इसलिए, दोषी होने की धारणा को गलत साबित करने के लिए, व्यक्ति को या तो यह साबित करना होगा कि कोई मूल अपराध (predicate offense) नहीं हुआ था, और इसलिए पैसा अपराध से मिली कमाई नहीं है; या मूल अपराध और पैसे के बीच संबंध से इनकार करना होगा—यह दिखाकर कि भले ही कोई अपराध हुआ हो, उससे पैसा नहीं बना; या यह दिखाना होगा कि व्यक्ति का पैसे से कोई संबंध नहीं है—उदाहरण के लिए, अगर पुलिस पैसे से भरा बैग लिए किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार करना चाहती थी, लेकिन गलती से किसी दूसरे व्यक्ति को वैसे ही बैग के साथ गिरफ़्तार कर लिया। यहाँ, पहले दो विकल्प बहुत मुश्किल हैं, खासकर ज़मानत के चरण में, उन मामलों में जहाँ व्यक्ति मूल अपराध में आरोपी नहीं है (और उसे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है) लेकिन, बाद में किसी निर्दोष लेन-देन के कारण, मनी लॉन्ड्रिंग का आरोपी बन जाता है। ऐसी स्थिति में, अपना बचाव करने की उनकी क्षमता बहुत सीमित हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट का इस कानून को सही ठहराना मनी लॉन्ड्रिंग से पैदा होने वाले खतरे पर केंद्रित था: यह प्रथा पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था और इस तरह देश के लिए खतरा बन सकती है। असल में, खतरा इतना गंभीर था कि कोर्ट ने फैसला सुनाया कि PMLA को एक सामान्य कानून के तौर पर नहीं देखा जा सकता। सबूत का बोझ उलटने, जांच एजेंसियों को विशेष अधिकार देने आदि जैसे प्रावधान, सामने आई चुनौती से निपटने के लिए ज़रूरी थे। कोर्ट ने ED के अधिकारों को ज़रूरत से ज़्यादा अधिकार के तौर पर नहीं, बल्कि एक विनाशकारी समस्या से निपटने के मददगार और असरदार तरीकों के तौर पर समझा। इसके अलावा, पारंपरिक जांच और संतुलन (checks and balances) की कमी से यह नतीजा निकालना गलत था कि यह व्यवस्था मनमाने अधिकारों को बढ़ावा देती है। ED किसी व्यक्ति के खिलाफ़ तभी कार्रवाई कर सकती है जब उसके पास व्यक्ति के दोषी होने का “विश्वास करने का कारण” हो—यह शर्त “इनबिल्ट सेफ़गार्ड्स” (पहले से मौजूद सुरक्षा उपाय) को दिखाती है।19 अहम बात यह थी कि संबंधित अधिकारी ज़रूरत पड़ने पर ही कार्रवाई कर सकता था, और वास्तव में करता भी। कोर्ट के लिए, मनी लॉन्ड्रिंग की खास समस्या ने PMLA को एक अनोखा (sui generis) कानून बना दिया। इस कानून को सिर्फ़ सज़ा देने वाला कानून नहीं कहा जा सकता। इसलिए, पुलिस पर लागू होने वाले नियम ED पर लागू नहीं होते थे। समाज के लिए आम खतरे से निपटने के लिए पहले से कदम उठाने (preemption) की ज़रूरत थी, और ऐसा सिर्फ़ एग्जीक्यूटिव फ़ैसले से ही हो सकता था, जिसके लिए बाकी सभी फ़ैसलों को रोकना ज़रूरी था।
The Authoritarian Argument
Madhav Khosla
साभार: Journal of Democracy

