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“ख़ामोश रिश्तों की चीख़”

तुम कहते रहे —
“तुम तो हमेशा ज़्यादा सोचती हो…”
मैं हर बार कम बोलती गई,
हर बार थोड़ा और खोती गई।

तुमने कहा —
“तुम बातों को बढ़ा देती हो…”
मैंने हर घाव को छोटा मान लिया,
अपने आँसुओं को तकिए में छिपा लिया।

तुमने जताया —
“मैंने वो मतलब नहीं निकाला…”
और मैं अपने अर्थ को
अपने ही अंदर गुम करती गई।

मैंने हर बार
तुम्हारे शब्दों से ज़्यादा
तुम्हारे मौन को पढ़ा।

मैंने हर तर्क को
प्यार की तरह समझा।

पर जब खामोशी भी
अब संवाद नहीं रही,
तो मैंने खुद से कहा —
“अब और नहीं…”

अब मैं
किसी की सही होने की परिभाषा में
गलत नहीं बनूंगी।
अब मैं
अपने भीतर के आइने से
मुलाक़ात करूंगी।

प्रियंका सौरभ

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