“ तू राजा होगा अपने घर का, मंत्री संत्री से मुझे क्या लेना,’ वहीं दूसरी और किसी के ज्ञान, त्याग, संघर्ष के ताप की जरा सी भी आंच मन को छू गई तो उसके सामने दंडवत होने में भी कोई कोताही नहीं। इसी जहनियत राजीव नयन बहुगुणा की कलम से वक्त वक्त पर लिखी गई इबारतें “काजल कोठा” किताब लीक से हटकर लगे तो कोई अचरज नहीं।
इंसानी जीवन से ताल्लुक रखने वाले हर मौजू पर अपनी खास शैली में रोशनी बिखेरी है। गहन गंभीर विचारोत्तेजक विषयों पर भी शब्दों की कलाबाजी पांडित्य का प्रदर्शन करने की बजाय आम लोगों की बातचीत वाले अंदाज में सवालों को खड़ा करने और खुद ही अपनी सोच के मुताबिक उसका जवाब या रास्ता सुझाने का काम भी किया है। एक बात साफ तौर पर नजर आती है की लेखक हिर फिर कर हिमालय की तलहटी में बसे उत्तराखंड के लोगों के दुख-सुख, रीति रिवाज़, संस्कृति, कुदरती कहर, सरकारी दोहन की योजनाओं, उजड़ते गांव, पलायन पर बिफर कर
‘और कितने भूकंप चाहिए की यह निंद टूटे’ ‘शहरी लूटेरो। हट-हट, दुर-दुर’, ‘दुनिया भर में पस्त है पहाड़,’ ‘हिमालय क्षेत्र में अनर्थ की आशंकायें’ ‘गंगा से ऐसा बर्ताव ना करें’ ‘गंगा के लिए एक देह आहूति’ ‘बहुओं का अकाल’ ‘एक बार फिर हिमालय के आर-पार’ जैसे लेखों में निर्मम होकर व्यथा व्यक्त करते हैं।
‘एक चादर उजली सी’ में लेखक प्राकृतिक समृद्धि और साफ हवा कभी भी हिंसक और बुरे विचार की ओर नहीं जाने देती लिखकर पहाड़ी जीवन का निचोड़ प्रस्तुत करते हैं।
दूसरों पर व्यंग करने के साथ-साथ अपना मजाक उड़ाने की इमानदारी भी बरतता है कि
‘एक परचे में एकजामनर से मिलकर बेईमानी से नंबर बढ़वाये,
‘ ‘कुछ ही समय बाद पाया कि राजनीति का मेरे अंदर सॉफ्टवेयर ही नहीं है, जैसे शादी की तैयारी करते किसी व्यक्ति को हठात पता चले कि उसके तो अंडकोष ही नहीं है।’
कामुकता, श्रृंगार रस में गोते लगाता लेखक देश-विदेश नीति के गहन गंभीर मामालों ‘चीन से ना डरने की जरूरत है,न मुग्ध होने की,’ ‘कावेरी: एक नदी, दो शिकारी’ ‘ब्रह्मपुत्र की राह रोकने के खतरे’ ‘राज सुराज कुछ आग कुछ धुआं ‘जाओ राजा हम ठोएंगे पालकी’ ‘माओ नाम का तो बहाना है, भी लिखता है। ‘ लेखक इतिहास, कला, साहित्य, संस्कृति, आर्थिक सामाजिक सभी विषयों पर टिप्पणी करता है, परंतु दिमाग जहां एक और हिमालय के पहाड़ों पर विचरण करता है वहीं उसके अंतर्मन की रसमयता भारतीय लोक, शास्त्रीय संगीत मे विचरण करते रहती है। आलम के रंग लाख सही तु मगर कहाँ सुनो और सम जाओ यह सिलसिला खत्म होने को है। बेबाक, बेखौफ, बिना लाग लपेट जैसा देखा, समझा लिख दिया की तर्ज पर बनी इस किताब को अगर पढ़ना शुरू कर दिया तो खत्म किए बिना उठना मुश्किल हो जाएगा।
“ काजल कोठा “ किताब को समाजवादी चिंतक प्रो . राज कुमार जैन दिया आशीष

